Friday, 31 May 2013

प्रथम अध्याय

ॐ श्री पशुपतये नमः॥

बाबा अनुरागनाथ अपने आसन पर विराजमान हैं। पास ही मुनियों में श्रेष्ठ श्री सुनीताचार्य अपने कुशासन पर ध्यानमग्न हैं। दोनों महर्षियों के बीच हुई एक अद्भुत संवाद का आविर्भाव प्रतीक होता इंद्रियों को ज्ञात हो रहा है।

सुनीताचार्य जी कहते हैं, "श्री हरि की असीम अनुकंपा से पृथ्वीलोक में मानवों एवं समस्त प्राणियों के विकास की गति सदैव चलायमान है। इसी के संदर्भ में एक भैंस गुप्ता नामक प्राणी की चर्चा पृथ्वी लोक में चरम पर है। हे मुनिवर, ये भैंस गुप्ता किस प्रकार का प्राणी है, इसका विकास कैसे हुआ? मुझे इसका ज्ञान प्रदान करें।

बाबा अनुरागनाथ कहते हैं, "है मुनीन्द्र सुनीताचार्य, आप साधुओं में उत्तम, ज्ञानियों में श्रेष्ठ, एवं समस्त विद्याओं के धनी हैं। आपको मैं उस प्राणी के बारे में बताता हूँ, जिसे पृथ्वी लोक में भैंस गुप्ता के नाम से जाना जाता है।"

"हे मुनिवर, भैंस गुप्ता का जन्म मनुष्य योनि में ही हुआ था। दिखने में ये बिलकुल मनुष्य की तरह हैं, परंतु जन्म के तुरंत पश्चात इनकी पाशविक गतिविधियों ने स्वयं को प्रकट करना शुरू कर दिया। पाँच वर्ष के होते होते श्री भैंस गुप्ता की पाचन शक्ति इतनी तीव्र हो गई, की हिण्डौन सिटी के सारे किसानों में इनके नाम-मात्र से ही भय का संचार होता था। बागान वालों, नर्सरी वालों की इनके दर्शन से ही फटती थी। कोतवाली में हर दिन कई कई एकड़ फसल रातों-रात चट हो जाने की रपट लिखाई जाती थी, परंतु दारोगा ने कभी भी श्री भैंस की गिरफ्तारी की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया।"

सुनीताचार्य जी विस्मित होकर कहते हैं, "परंतु हे मुनिवर, दोषियों को दंड देना विधि का विधान है! दारोगा द्वारा श्री भैंस को गिरफ्तार न करने का कारण क्या हो सकता है? क्या एक वीर दारोगा भी इतना फट्टू हो सकता है?"

बाबा अनुरागनाथ मुसकुराते हुए कहते हैं, "मुनिवर, बिना प्रैशर के गैस और बिना सींघ के भैंस से किसी की नहीं फटती। दरअसल बात दुग्ध की है , महर्षि, दुग्ध की! श्री भैंस गुप्ता कहने को तो उन दिनों स्तनविहीन थे, परंतु हर शाम दो से चार लिटर दूध दे ही दिया करते थे। उसी दूध का एक ग्लास पीकर दारोगा जी ने अपनी शादी की रात एक ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था। दारोगा का पुत्र श्री भैंस के ही दूध में बोर्नविटा मिला कर पी के कक्षा में टॉप मारे जा रहा था। उनके लिए श्री भैंस को गिरफ्तार करना अक्षम्य पाप था!"

सुनीताचार्य जी कहते हैं, "मुनिवर! अब मुझे श्री भैंस गुप्ता के करियर के बारे में बताएं। एक भैंस होने के नाते उनका मनुष्यों में सरवाइव करना किंचित दुष्कर हुआ होगा?"

बाबा ने कहा, "बिलकुल सही समझा आपने। शुरुआत थोड़ी मुश्किल रही। भैंस गुप्ता जी ने अपना करियर क्रिकेट से शुरू किया। क्रिकेट खेलने वक़्त हमेशा आउटफील्ड पर फ़िल्डिंग करते थे, और उधर की सारी घास को हजम कर जाते थे, जिसकी वजह से आउटफील्ड काफी फास्ट हो जाती थी! विरोधी टीम के बल्लेबाज जम कर चौके पेलते, और मैच के बाद ड्रेसिंग रूम में श्री भैंस को विकेट रूपी खूंटी से बांध कर खूब पेला जाता था।
फिर उन्होने पिच क्यूरेटर का काम करना शुरू किया। पिच की घास को भली-भांति चर कर ये उसको स्पीनरों के अनुकूल बना देते थे। मगर उनके इस सुनहरे करियर को विराम तब लगा, जब अंजाने में इनहोने लॉर्ड्स की पिच पर ही गोबर कर दिया। आई.सी.सी. ने तुरंत ही इन्हे बर्खास्त कर भारत रवाना कर दिया।

सुनीताचार्य जी कहते हैं, "हे महर्षि, श्री भैंस गुप्ता को इंजीनियर बनने की प्रेरणा कैसे मिली? मैं मानता हूँ कि एक पशु भी अपना घर बनाता है। परंतु दैट डज नोट मेक हिम ए सिविल इंजीनियर! श्री भैंस गुप्ता ने इंजीनियर बन ने की कैसे ठानी, कृपया इसका वर्णन करें।"

बाबा मंद-मंद मुस्कान के साथ बोलते हैं, "बात तब की है, जब श्री भैंस गुप्ता ईडेन गार्डेन्स में आउटफील्ड पर फ़िल्डिंग कर रहे थे। आई मीन, फ़िल्डिंग कम कर रहे थे और चर ज्यादा रहे थे। तभी उनकी नजर एक बंगाली बालिका पर गई। हे महर्षि, हे प्रणेता, आपको कालांतर में ये ज्ञात होगा, कि ये बालिका भी एक गुप्ता ही थी। कौन सी गुप्ता थी, कैसी गुप्ता थी, आदमी थी या जानवर, सुशील थी या बकलोल,  इसका निर्णय आगे के अध्यायों में होगा।"

सुनीताचार्य जी ने एक गोल्डफ्लेक सुलगा लिया। प्रेम से एक कश लगाया, और नाक से धुआँ निकालते हुए जिज्ञासापूर्वक कहा, "मुनिवर! फिर क्या हुआ?"

बाबा उवाच, "मैच के तुरंत बाद श्री भैंस ने कोच को दुलत्ती जमाई, और छह लिटर दूध (मलाई के साथ) लेकर उस बाला से मिलने गए। बाला ने आज तक किसी मानव-भैंस से इंटरैक्ट नहीं किया था, अतः दूध लेने में वो काफी सकुचा रही थी, कि क्या भरोसा, दूध हो या पता नहीं क्या हो! परंतु संयोगवश, उस बंगालन की संगीत में अत्यधिक रुचि थी। उस शाम वो बीन बजाती रही, और श्री भैंस बैठ कर पगुराते रहे। आहा! क्या रोमांटिक सीन था! "

सुनीताचार्य जी ने सुट्टा बाबा की ओर बढाते हुए कहा, "अब मुझे समझ आया उस मुहावरे का मतलब! भैंस के आगे बीन बजाओ, भैंस बैठ पगुराए!"

बाबा ने कथा कंटीन्यू करते हुए कहा, "संगीत के बाद श्री भैंस ने उस बालिके को एक गायिका बन जाने की सलाह दी। लेकिन उन्हे पता चला की बालिके को पहले इंजीन्यरिंग करनी है। मन मसोस कर रहे गए श्री भैंस।
लेकिन तकदीर ने पलटी खाई। लॉर्ड्स का गोबर कांड इनके जीवन में एक नई किरण लेकर आया। लंदन से बर्खास्त होकर भारत आने के बाद इनके पास कोई काम नहीं बचा था। इन्हे उस बालिका के इंजीनियर बन ने की बात याद थी, अतः इनहोने भी इंजीन्यरिंग की तैयारी शुरू कर दी।"

"श्री भैंस का रिज़ल्ट काफी मस्त रहा। उन्हे और भी कई कॉलेज मिल सकते थे, एक तो अच्छा रिज़ल्ट, ऊपर से उनका मवेशी कोटा! लेकिन सिल्चर चुन ने के पीछे मूल रूप से दो कारण थे। पहला कारण, कि सिल्चर वाले कॉलेज के प्रांगण में हरियाली अत्यंत मनोहर थी। वैबसाइट देख कर ही श्री भैंस के मुह से लार टपकने लगी! घास, पत्तियाँ, टहनियाँ प्रचुर मात्र में उपलब्ध! और दूसरा कारण, गुप्त सूत्रों से पता चला था कि ईडेन गार्डेन वाली, बीन वाली वो बालिका का भी सिल्चर में ही दाखिला संभावित था!"

सुनीताचार्य जी ने तब तक एक चिलम भी सुलगा ली थी। खाँसते हुए कहा उन्होने, "महर्षि! तो क्या अब श्री भैंस कॉलेज जाएंगे? भैंस होते हुए भी मनुष्यों के कॉलेज जाएंगे?"

बाबा अनुरागनाथ ने कहा, "मुनिवर! धैर्य रखें, मैं सबका वर्णन करूंगा, मगर अगले अध्याय में। इस अध्याय के लिए इतना ही। बातों ही बातों में आपने पूरी गोल्डफ्लेक अकेले खींच दी। अब थोड़ा ये चिलम बढ़ाया जाए!"

इति प्रथमो-अध्याय समाप्त:॥